भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के कहने पर 1956 में रक्षा विज्ञान प्रयोगशाला, दिल्ली में एक विकिरण प्रकोष्ठ की स्थापना की गई थी। इसे नामिकीय और व्यापक विनाश के अन्य हथियारों के प्रयोग से होने वाले परिणामों के संबंध में अध्ययन करने का प्रारंभिक कार्य सौंपा गया था। लेकिन जल्दी ही यह महसूस किया गया कि नामिकीय ऊर्जा मानव के कल्याण के लिए भी काम में लाई जा सकती है। रेडियोआइसोटोप से शांतिपूर्ण चिकीत्सीय अनुप्रयोगों का भी पता लगाया जा सकता था है। इसलिए, कार्य का दायरा बढ़ाया गया और प्रकोष्ठ को 1959 में विकिरण चिकित्सा प्रभाग के रुप में उन्नत कर दिया गया। जैसे जैसे जागरुकता बढ़ी, वैसे वैसे कार्य भी बढ़ा और 1961 में एक पूरा विभाग सृजित कर दिया गया और इसका नाम नामिकीय औषिध तथा संबद्ध विज्ञान संस्थान रखा गया। तब से अनुसंधान और विकास कार्य करके तथा नामिकीय औषिध और संबद्ध विज्ञान के विभिन्न पहलुओं में उत्कृष्टता के मोडल के रुप में सेवा प्रदान करके हमने लंबी दूरी तय कर दी है। इन वर्षों में संस्थान की गतिविधियों में विस्तार तथा व्यापक रुप से प्रसार हुआ है। इसकी गतिविधियों के क्षेत्र को मूल और चिकित्सा विज्ञानों, अनाक्रमक इमेजिंग और थायराइडोलोजी में अनुसंधान के अनेक क्षेत्रों को शामिल करके विस्तार कर दिया गया है। अनेक नैदानिक सुविधाएं, जो अनुसंधान गतिविधियों से प्राप्त होकर रोगियों के लिए लाभदायक हो सकती हैं, इनमास के अंतर्गत उपलब्ध हैं।