डॉ. राव ने 1975 में भारतीय मिसाइल कार्यक्रम के केंद्र डीआरडीएल, हैदराबाद में डीआरडीओ में सेवा आरंभ की तथा 1986 से 1998 तक ’’सोलिड प्रोपल्सन’’ प्रभाग का नेतृत्व किया। आईजीएमडीपी में उनके उत्कृष्ट योगदान के आधार पर उन्हें जुलाई 1998 से वैज्ञानिक ’जी’ के पद पर पदोन्नत किया गया और उन्होंने उन्नत सिस्टम कार्यशाला (एएसएल), हैदराबाद में सोलिड प्रोपल्सन सिस्टम केंद्र के निदेशक का उत्तरदायित्व संभाला। उनके तकनीकी-प्रबंधकीय प्रयासों के कारण उन्हें अप्रैल 2004 से निदेशक के रुप में एचईएमआरएल का मुखिया बनाया गया, यह देश में एक महत्वपूर्ण और अपने प्रकार की एकमात्र अनुसंधान प्रयोगशाला है।
डॉ. राव डीआरडीओ के विभागों में ख्यातिप्राप्त प्रणोदक अभिकल्प इंजीनियर हैं जिनका सामरिक और रण संबंधी मिसाइलों की विभिन्न श्रेणियों में प्रणोदक प्रणाली के क्षेत्र में समृद्ध अनुभव है। उन्होंने अग्नि, त्रिशूल, नाग, के-15 और डीआरडीओ के अन्य महत्वपूर्ण कार्यक्रमों के लिए प्रणोदक प्रणालियों के व्यापक अभिकल्प और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लक्ष्य (बूस्टर), सैम- II और सैम-III के लिए प्रणोदक प्रणालप में डॉ. राव का अन्य महत्वपूर्ण योगदान रहा। केस बोंडेड मोटरों, बड़े रॉकेट मोटर सिस्टम, फ्लेक्स नोज़ल नियंत्रण प्रणाली, जेट वेन नियंत्रण प्रणाली, कैनिस्टर चालित मिसाइलों के लिए गैस सृजन प्रणाली और अत्याधुनिक सुदृढ़ इस्पातों के लिए फेब्रिकेशन प्रौद्योगिकी सहित जटिल तथा अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी का विकास उनके असाधारण नेतृत्व का परिणाम है।
डॉ. राव विभिन्न रॉकेट मोटर्स क्षेत्र के लिए अभिकल्प और विकास के लिए नवीनतम सीएडी हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर उपस्कर और तकनीकियों को स्थापित करने में प्रमुख उत्प्रेरक रहे हैं। कुछ सॉफ्टवेयर प्राणलियों के नाम; 3डी प्रणोदक ग्रेन समरुपण अभिकल्प, बैलिस्टिक निष्पादन अनुमान, प्रणोदक का ऊष्मा अंतरण और ढांचागत विश्लेषण, पाइरोजन इग्नाइटर पारेषण विश्लेषण, फ्रैक्चर विश्लेषण और विभिन्न प्रक्षेपास्त्र प्रणालियों के लिए लागू फ्लेक्स नोज़ल डिजाइन समाधान हैं।
रॉकेट अभिकल्पन और संबंद्ध प्रौद्योगिकियों में अपनी केंद्रीय भूमिका के अतिरिक्त डॉ. राव की अनेक अवसंरचनात्मक सुविधाओं के सृजन, फ्लेक्स सील परिक्षण, पर्यावरणीय अर्हता, रॉकेट गठन, 6 अवयन स्थिर परीक्षण और भण्डारण सुविधाओं, जिनकी आवश्यकता रॉकेट मोटरों के विकास चक्र में पड़ती है, के सृजन में अग्रणी भूमिका रही है। वे डीआरडीओ के अंतर्गत बड़े आकार के केस बोंडेड मोटरों के प्रणोदक प्रसंस्करण संयत्र की योजना, निमार्ण और चालू करने में निकट रुप से जुड़े रहे हैं। रक्षा क्षेत्र में गैर सरकारी उद्योगों के साथ सामरिक भागीदारों में दृढ़ विश्वास रखने वाले डॉ. राव ने प्रीमियर एक्सप्लोसिव लिमिटेड, एचबीएल इत्यादि जैसे कुछ गैर सरकारी कंपनियों के साथ सफलतापूर्वक भागीदारी की जिससे उच्च ऊर्जा सामग्री अर्थात पाइरो, एचई और प्रणोदकों का उत्पादन किया गया। उन्होंने पैंडियन रसायनों में एमोनियम परक्लोरेट तथा एना बोंड में एचटीबीपी जैसे सामरिक कच्ची सामग्रियों के लिए उत्पादन केंद्र स्थापित करने में भी जिम्मेदारी निभाई।
आत्मनिर्भरता के क्षेत्र में उनके महत्वपूर्ण योगदान से उन्हें जमीन से आसमान में मार करने वाली सैम-II प्रक्षेपास्त्र के लिए प्रणोदक प्रतिस्थापन हेतु "गोल्ड शील्ड" पुरस्कार दिया गया। रक्षा अनुसंधान में उनके असाधारण वैज्ञानिक और तकनीकी योगदान के लिए उन्हें 2001 में अपने पुराने शिक्षा संस्थान एनआईटी वारंगल द्वारा "विशिष्ट अल्यूमनी" पुरस्कार से नवाजा गया। उन्हें प्रबंधन के लिए आर्डर ऑफ मेरिट पुरस्कार दिया गया और भारतीय प्रबंधन कार्यकारी परिषद द्वारा समाजश्री के रुप में सम्मानित किया गया। उन्हें 14 मई 2006 को प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह के द्वारा "साइंटिस्ट ऑफ द ईयर" से भी पुरस्कृत किया गया।
उनके विभिन्न राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं में 45 से भी अधिक तकनीकी लेख प्रकाशित हुए। उन्होंने राष्ट्रीय/अंतर्राष्ट्रीय सेमिनारों/संगोष्ठियों के दौरान अनेक तकनीकी बैठकों में भाग लिया और उनकी अध्यक्षता की। वे विभिन्न ख्यातिप्राप्त व्यावसायिक निकायों में सक्रिय रुप से शामिल रहे हैं। वे इंस्टिट्यूशन ऑफ इंजीनियर्स के फेलो हैं, एरोनोटिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया के फेलो हैं, आईएसएएमपीई के सदस्य हैं तथा एरोनोटिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया के सदस्य हैं। वर्तमान में वे एरोनोटिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया (एईएसआई) की पुणे शाखा के सभापति तथा हाई एनर्जी मेटीरियल सोसाइटी ऑफ इंडिया (एचईएमएसआई) के अध्यक्ष हैं।
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