काल क्रम मे धीरे धीरे इस प्रयोगशाला मे स्वतंत्र रूप से अनुसंधान एवं विकास कार्य होने लगे,जिसका मुख्य उद्देश्य सामरिक रूप से महत्वपूर्ण इस क्षेत्र मे पदस्थापित सेना के जवानों को मदद पहुँचाना था। सन १९८० के अक्टूबर मास में इसे पूर्ण रूप से सक्षम प्रयोगशाला का दर्जा प्राप्त हुआ एवं इसका नामकरण रक्षा अनुसंधान प्रयोगशाला (र० अ० प्र०) किया गया। पूर्वोत्तर भारत के दुर्गम क्षेत्र में अति विपरीत जलवायु मे कार्य कर रहे सेना के जवानों की आवश्यकताओं को पूरा करने के निरंतर कोशिशों के साथ-साथ यह प्रयोगशाला जवानों के जीवन और जीवनदशाओं मे सुधार करने के लिये समर्पित है। र० अ० वि० स० के निर्देशानुसार इस प्रयोगशाला के अनुसंधान एवं विकास कार्यों का उपयोग क्षेत्रीय आबादी के सामाजिक एवं आर्थिक दशाओं मे सुधार के लिये किया जाता है। इस प्रयोगशाला के वैज्ञानिकों का दल नियमित रुप से अग्रिम मोर्चों का भ्रमण करता है, ताकि मौके पर जाकर जवानों को पेश आ रही समस्याओं का समाधान खोजा जा सके।
वर्तमान समय मे इस प्रयोगशाला ने अपने अनुसंधान एवं विकास कार्यों को,मलेरिया नियंत्रण,पेयजल की गुणवत्ता,मानव एवं पशुओं के उपयोग के लिये पादप सामग्री इत्यादि क्षेत्रों में केन्द्रित किया है। विभिन्न प्रयोगशालाओं,महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों के साथ इस प्रयोगशाला का बड़ा ही घनिष्ठ संबन्ध है। प्रयोगशाला एवं इन संस्थानों के बीच विशेषज्ञों,ज्ञान तथा उपलब्ध तकनीकी सुविधाओं का आदान-प्रदान किया जाता है ताकि अपने लक्ष्यों को आसानी से प्राप्त किया जा सके। |