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सफलता पूर्वक पूर्ण की गयी योजनायें
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त्वरितलौहपरीक्षणकिट
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त्वरितजलपरीक्षणकिट
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जललौहनिष्कासनइकाई
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मच्छरनियंत्रणकेलियेजैविकलार्वाभक्षीकापृथक्कीकरण
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मच्छरनियंत्रणकेलियेपादपसामग्रीसेतैयारवाष्पशीलद्रव्य
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बहुपादपमशकप्रतिकर्षक
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पादप सामग्री से तैयार जैव-निम्नीकरणीयलार्वानाशीतैरतीटिकिया
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सैन्यएवंसाधारनजनताकेनिवासस्थानोंमेमलेरियानियंत्रण
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एंटीडर्मेटोफीटिकजड़ीबूटीयुक्तमरहमप्रतिपादन
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छत्रक उत्पादन एवं कृमि-खाद (वर्मी कम्पोस्ट)बनानेकीकमखर्चीलीतकनीकोंकाविकास
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विश्वकीसर्वाधिकतीखीमिर्चकीपहचान
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रक्षा अनुसंधान प्रयोगशाला की उपलब्धियाँ विस्तारपूर्वक |
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त्वरित लौह परीक्षण किट
प्रयोगशाला से बाहर जल में लौहे की मात्रा का अनुमापन करने के लिये एक त्वरित लौह परीक्षण किट का निर्माण किया गया है।
लाभः
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सटीकता ± 0.1 ppm
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परीक्षणकेपरिणामसहीएवंसंख्यात्मकहोतेंहैं।
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आसानीसेकिटकोविभिन्नजगहोंपरलेजायाजासकताहै।
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अर्ध-निपुणव्यक्तिभीजलमेलौहेकीमात्राकेबारेमेसहीपरिणामदेसकताहै।
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| त्वरित जल परीक्षण किट
र० अ० प्र० ने त्वरित जल प्ररीक्षण इकाई 'गुंज' का निर्माण किया है। गुंज दुर्गम क्षेत्रों मे निवास कर रहे लोगों के लिए विशेष महत्वपूर्ण है क्योंकि इन क्षेत्रों मे स्वच्छ पेय जल की अनुपलब्धता रहती है। ऐसे क्षेत्रों में जल-जनित रोगों से छुटकारा पाने के लिये पेयजल की गुणवत्ता की जाँच आवश्यक है। जल-जनित रोग जन-स्वास्थ्य के लिये बहुत ही घातक हैं। कोई भी अल्प शिक्षित व्यक्ति अपने साधारण ज्ञान के इस्तेमाल से 'गुज' का प्रयोग करके जल की गुणवत्ता का पता लगा सकता है। यह इकाई जल का परीक्षण भौ-रसायनिक और जैविक,दोनों तरीकों से करती है। गुंज से जल का जैविक परीक्षण स्वीकृत/अस्वीकृत आधार पर होता है। इस इकाई से निम्न प्रकार की जाँच की जा सकती है- |
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pH
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फ्लोराइड
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जलकागँदलापन
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नाइट्रेट
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कुलकठोरता
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शेषक्लोरीन
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क्लोराइड
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लौह
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कोलिफार्मजीवाणु
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लाभः
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इसकिटकेसाथजलके१००परिक्षणोंहेतुआवश्यकरसायनदियेगयेहैं।
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बाजारमेंउपलब्धअन्यकिटकीतुलनामेयहकिटअधिकटिकाऊएवंसस्ताहै।
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इसकिटकोपर्वतीयक्षेत्रोंमेलेजानाऔरउपयोगकरनाबड़ासरलहै।
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इसकिटकोउपयोगमेलानेकेलियेबिजलीकीकोईआवश्यकतानहीहै।
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किट की उपयोग विधि सरल एवं सटीक है। कोई अर्ध-निपुण व्यक्ति भी इसका
उपयोगकरसकताहै।
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यहपेयजलकीगुणवत्तासुनिश्चितकरताहै।
उपयोगकर्त्ताः
रक्षा सेवायें,जन स्वास्थ्य एवं अभियंत्रण विभाग,असम सरकार,भारतीय भू-सर्वेक्षण विभाग।
जल लौह निष्कासन इकाई
जल में लौह की अधिक मात्रा उपयोग कर्त्ता के लिए कई तरह की परेशानियाँ खड़ी कर देती है। र० अ० प्र० तेजपुर ने एक उन्नत जल लौह निष्कासन इकाई की परिकल्पना एवं निर्माण किया है,जिससे घरेलू कार्यों के लिए साफ पीने का पानी उपलब्ध करवाया जा सके। जल लौह निष्कासन इकाई बेलनाकार है। यह मृदु-लोहे की बनी है। इसमें चार कक्ष बने हैं तथा लौहयुक्त कीचड़ को बाहर निकालने के लिए कपाट लगे हुए हैं। इकाई के सुचारु कार्यान्वयन के लिए इसमे वायवीकरण तंत्र एवं दोहरे छनाई तल का प्रबंध किया गया है। लौह निष्कासन प्रकिया में निम्नलिखित चरणों का समावेश है- |
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वायवीकरण/ गैसों का आदान-प्रदान
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हाइड्रोजनआयनोंकीसंख्याकासंतुलन
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फेरसआयनकाफेरिकआयनमेआक्सीकरण
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लौहअवक्षेपकातलछटीकरण
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पृथकहुयेलोहेकीदोहरीछनाई
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नीचे के कक्ष से लौह-मलकानिष्कासन
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इस इकाई से ३०० लीटर प्रति घंटे की दर से शुद्ध जल प्राप्त होता है। यह इकाई इतनी सक्षम है कि
४० मिलीग्राम/लीटर लौह सांद्रता वाले जल को शुद्धिकरण करके लौह सांद्रता को विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा अनुमोदित ०.३ ppm सांद्रता तक कम कर सकती है।
यह लौह निष्कासन इकाई दुर्गम क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की पेयजल की आवश्यकता को पूर्ण कर सकती है,क्योंकि इन क्षेत्रों में जल शुद्धिकरण के आधुनिक संयत्रों का निर्माण एवं स्थापना कठिन है। यह दूर दराज क्षेत्रों में स्थित छोटे समुदायें और सेना ईकाइयाँ ,भोजनालयों, सैनिकों के लिये बने घरों के लिए उपयोगी है। |
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जल लौह निष्कासन इकाई के लाभ
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उपयुक्तवायवीकरण
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लौह के बड़े भाग का तलछटी-कक्षमेनिष्कासन
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छनाई तल में कोई टूट-फूटनहीएवंछनाईतलकीलंबीकार्यावधि
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दोहरेछनाईकरणकेकारणलौहकासमुचितनिष्कासन
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उपयुक्तरुपसेइकाईमेंजमालौहयुक्तगंदगीकीसफाई
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इकाईकीसरलकार्यविधिएवंआसानरखरखाव
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उपयोगकर्त्ता
रक्षा सेवाएँ
अब तक ब्यवसायिक रुप से बेची गयी जल लौह निष्कासन इकाईयाँ
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सैन्य इकाईयाँ-७
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पूर्वी कमान मुख्यालय,कोलकाता-२००
मच्छर नियंत्रण के लिये जैविक लार्वाभक्षी
र० अ० प्र० तेजपुर ने मृदा से कीट-रोगकारक जीवाणुओं को पृथक किया है,जो एनोफिलीज एवं क्युलेक्स लार्वा के विरुद्ध अत्याधिक सक्षम है। यह एडीज प्रजाति के विरुद्ध भी अत्यंत प्रभावशाली है। इस जीवाणु की पहचान बैसीलस स्फैरीकस-जी०सी० सह-वर्ग चार के रुप में की गयी है। यह जीवाणु अपने पारास्पोरेल् स्फटिक डेल्टा अंतःविष की मदद से मच्छरों के लार्वा के विरुद्ध कार्य करता है। |
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यह अंतःविष मच्छरों के लार्वा के मध्य आँत एपीथैलीयम को नष्ट कर देता है,फलस्वरुप आँत की सामग्री शरीर गुहा एवं खून में मिल जाती है जिससे लार्वा का भोजन ग्रहण बंद हो जाता है। अंत में खाद्यहीनता के कारण लार्वा मर जाता है। वास्तविक परिस्तिथितियों में किये सतत परीक्षणों के आश्चर्यजनक परिणामों के बाद बैसीलस स्फैरीकस-जी०सी० सह-वर्ग चार का उपयोग १०% रवादार पदार्थ बनाने में किया गया। यह १०% रवादार पदार्थ बहुत ही सक्षम जैविक लार्वाभक्षी है।
वास्तविक उपयोग के लिये इस लार्वाभक्षी की सुझाई गयी मात्रा १०० ग्राम/हेक्टेयर हैं। इस मात्रा का पानी की सतह पर एक नैपसैक छिड़काव यंत्र की सहायता से समान रुप से छिड़काव करना चाहिये। |
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लाभः
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इसमिश्रणमेंकोईरसायनिकतत्वनहीहै
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पर्यावरण के अनुकूल,यहाँतककिपीनेयोग्यपानीकेलिएभीप्रयोगसंभव
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एनोफिलीज एवं क्यूलेस के लार्वा को भिन्न आवास स्थलों में नियंत्रित करने में भी अत्याधिक कारगर/सक्षम
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आसान उपयोग,परिवहनएवंभंडारण।शहरीएवंग्रामीणदोनोक्षेत्रोंमेंकारगर
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प्रति-मशक पादप वाष्पीकारक |
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पूर्वोत्तर भारत का क्षेत्र चिकित्सीय,कीटनाशक एवं अपवारक वनस्पतिओं से समृद्ध हैं। इन वनस्पतिओं का अध्ययन उनके लार्वाभक्षी,प्रति-मशक एवं अपवारक गुणों को पहचानने के लिये किया गया हैं। इन पौधों के अर्क से एक पादप-वाष्पीकारक का निर्माण किया गया है,ताकि मच्छरों को मानवीय आवासों से दूर रखा जा सके। एक अन्य युक्ति भी निर्मित की गयी है जो मानवीय निवास-स्थलों मे रहने वाले मच्छरों को २ घंटे के अल्प समय में प्रति-मशक वाष्प के द्वारा मार सकती है। यह प्रति-मशक वाष्प एक विद्युत चालित यंत्र से उत्पन्न होता है। इन दोनो युक्तिओं को गंधहीन केरोसिन तेल(मिट्टी का तेल) माध्यम मे पौधों का अर्क डालकर बनाया गया है। |
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| बहु-पादप मशक अपवारक
रसायनिक अपवारकों पर किए गए व्यापक अध्ययन से यह पता चला है कि यद्यपि ये अपवारक मच्छरों,काली मख्खियों एवं जोकों के विरुद्ध अत्यंत असरदार है,तथापि इनके चारित्रिक रसायनिक गंध,त्वचा एवं पलकों पर जलन इत्यादि कुप्रभावों के कारण जन-साधारण इनका उपयोग नही करना चाहते हैं। देखा गया है कि पौधों से प्राप्त आवश्यक तेल भी मच्छरों के काटने के विरुद्ध केवल १ या २ घंटे तक ही सुरक्षा दे पाते हैं।
र० अ० प्र० तेजपुर ने एक बहु-पादप मशक अपवारक का निर्माण किया है। यह अपवारक तीन अलग-अलग तरह के पादप तेलों का मिश्रण हैं। इनमे से हर पादप तेल मे मशक अपवारक बनने की असीम संभावना छुपी हुई हैं। प्रयोगशाला स्तर पर किये गये प्रयोगों के अनुसार यह अपवारक पाँच घंटें तक मशक दंश से सुरक्षा देता है।
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लाभः
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यहपूर्णरुपेणएकप्राकृतिकतेलहै।
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शरीरकेकिसीभीअंगपरकोईदुष्प्रभावनहीहोताहै।
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इससे भीनी-भीनीसुगंधआतीहै।
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इससे शरीर पर कोई दाग-धब्बेनहीपड़ते।
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| पादप सामग्री से तैयार जैव-निम्नीकरणीय लार्वानाशी तैरती टिकिया |
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पूर्वोत्तर भारत के कुछ पर्वतीय क्षेत्रों मे मच्छरों के ऐसे जनन-स्थल हैं जहाँ लार्वा नियंत्रण के लिये रसायनों का छिड़काव बिल्कुल भी संभव नही है। ऐसे क्षेत्रों के लिये र० अ० प्र० तेजपुर ने पादपों का उपयोग करके जैव-निम्नीकरणीय लार्वानाशी तैरती टिकिया तैयार की है। इस टिकिया को दो तरहों की पादप सामग्रियों को मिलाकर तैयार किया गया है। इनमे से एक पादप सामग्री टिकिया को बांधे रखने मे मदद करती है,वहीं दूसरी पादप सामग्री टिकिया को जल की सतह पर तैरने मे मदद करती है।
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लार्वानाशी गुणवाले पौधों का मिथेनोल मे तैयार किया गया अर्क टिकिया पर चढ़ा दिया गया है,जिससे टिकिया मे लार्वानाशी गुण आ गये है।
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लाभः
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यह तकनीक सरल एवं जैव-निम्नीकरणीय होने के साथ-साथअहानिप्रदजीवोंकेलियेनिरापदहै।
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वास्तविकजीवनकेलियेयहआसानीसेअपनानेयोग्यएवंसस्तीतकनीकहै।
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यह टिकिया जल के सतह पर ४ से ७ दिनों तक तैरती रहती हैं। लार्वानाशी पादप सामग्री टिकिया मे उपस्थित लस्सेदार पदार्थ के कारण धीरे-धीरेपानीमेघुलकरमच्छरोंकेलार्वाकोमारडालतीहै।
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टिकियाकालार्वानाशीगुण५दिनोंतकविद्यमानरहताहै।
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इच्छितजगहोंपरइसटिकियाकोखुदवहाँजायेबिनाभीफैंकाजासकताहै।
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टिकियाकोलंबेसमयतकभंडारितकियाजासकताहैएवंइसकापरिवहनसस्ताहै।
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चूंकि ऐनोफिलीज लार्वा जल की सतह पर तैरते हैं,अतःयहटिकियाइनकानियंत्रणकरतीहै।
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छावनियों और सामान्य जनों के निवास स्थलों मे मलेरिया नियंत्रण
निम्नलिखित न्यूनतम नियंत्रण कारकों के उपयोग के द्वारा लामा छावनी को मलेरिया मुक्त क्षेत्र के रुप मे सतत् रखरखाव- |
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परजीवी नियंत्रण
छावनियों और उसके आस-पास के ग्रामों में मलेरिया के लिये निरंतर रुप से मासिक निरीक्षण किया जाता है,ताकि मलेरिया की प्रारंभिक अवस्था मे ही पहचान और उपचार हो सके और लोगों के बीच परजीवीओं के प्रतिकूल प्रभाव को कम किया जा सके। स्लाइड धनता दर (एस० पी० आर०) १ और २७.५% के बीच दर्ज की गयी। |
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व्यैक्तिक सुरक्षा उपाय
छावनियों (३०९५) और सामान्य जनों के निवास-स्थलों (५३१९) में,कुल मिलाकर ८४१४ मच्छरदानियों को के-ओथ्रीन से २५ मिलिग्राम/वर्गमीटर की दर से संसिक्त कर बाँटा गया। यह संसिक्त मच्छरदानियाँ मानव और मच्छरों के संस्पर्श मे कमी लाने का एक कारगर व्यैक्तिक सुरक्षा उपाय है और मलेरिया विस्तार मे कमी लाती है। इन संसिक्त मच्छरदानियों को चार से पाँच महीनों तक के लिये प्रभावी पाया गया। |
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मलेरिया नियंत्रण के लिए दूर-संवेदी एवं भू-छायांकन तकनीकों का उपयोग
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तीन अध्ययन क्षेत्रों का भू-संबन्धीकरण एवं छायांकन,वहाँ की प्राकृतिक दशाओं के आधार पर LISS-IIIएवंपैनक्रामेटिककेद्वाराकियागया।
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अध्ययनक्षेत्रोंकामानचित्रणएवंमानचित्रोंकाविश्लेषण।
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मलेरियारोगवाहकोंकेगुणणकेलियेजिम्मेदारसंभावितवातावरणीयकारकोंकीपहचान।
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असम-अरुणाचल प्रदेश के सीमा पर स्थित चार मलेरिया ग्रसित क्षेत्रों की आई० आर० एस० के द्वारा पहचान। यह कार्य पूर्वोत्तर क्षेत्रीय जल एवं भूमि प्रबंधन संस्थान,तेजपुरकेसहयोगसेकियागया।
अचिन्हीत रोगकारकों की रोकथाम |
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मलेरिया के अचिन्हीत कारकों का पता एवं निदान करके गांव के लोगों को मलेरिया से बचाने के लिये विस्तृत मलेरिया जाँच अभियान चलाया गया। स्लाईड धनात्मकता दर (एस०पी०आर०) को ५.३-१०.५% के बीच पाया गया। मलेरिया के स्वतंत्र चिन्ह के रुप में विद्यालयी छात्रों के २४३४ रक्त नमूने लिये गये। स्लाईड धनात्मकता दर (एस०पी०आर०) एवं पी०एफ० प्रतिशतता क्रमशः ६.३% एवं ६९.५% के बीच पायी गयी। बच्चों मे मलेरिया की ऊँचीं प्रतिशतता का कारण,मलेरिया के प्रति उनकी संवेदनशीलता एवं समाज में अचिन्हीत रोगकारकों की उपस्थिति है। |
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चाय-श्रमिकों के बीच मलेरिया
मलेरिया के वार्षिक स्रोत ८०० चाय बगीचों में रहने वाले चाय श्रमिक असम की कुल आबादी का ३०% (६० लाख) हैं। शोनितपुर जिले (असम) के चार चाय बगीचों अर्थात् माजुलीगढ़,पाभोई,दिरिंग,बोरगांग चाय बगीचों के चाय श्रमिकों से लिए गए ८८८० रक्त नमूनों में स्लाईड धनात्मकता दर (एस०पी०आर०) ८.२५% से ४७.१% ज्ञात की गयी। पी०एफ० प्रतिशतता ४०-६८% के बीच ज्ञात की गयी।
कार्वि ग्राम,नाहरणि,होग्राजुलि,बालिजान बनुआ,रामणि,केकुरीजान,भालुकपोंग,गमनी,सटाई और निगाम इत्यादि ग्रामों जो कि असम-अरुणाचल प्रदेश सीमा पर स्थित है और नागालैण्ड के खेकिहो ग्राम में हुए मलेरिया के केन्द्रीय प्रकोप पर नियंत्रण किया गया।
मलेरिया जागृतिकरण शिविर
शोनितपुर जिले (असम),नागालैण्ड एवं अरुणाचल प्रदेश के सैनिक छावनियों एवं आस-पास के क्षेत्रों में मलेरिया जागृतिकरण शिविरों का आयोजन किया गया। इन क्षेत्रों के मच्छर नियंत्रण उपायों को प्रोत्साहित किया गया।
जी०-६ पी० डी० कमी की खोज
जी०-६ पी०डी० लाल-रक्त कोशिकाओं के उपापचयन मे होने वाली एक अनुवांशिक कमी है। इस कमी से ग्रस्त व्यक्ति कुछ विशेष दवाईयों के उपयोग के बाद रुधिरलयित-रक्तहीनता से ग्रसित हो जाता है। अतः उपचार के समय उचित दवाईयों के प्रयोग के लिए जी०-६ पी०डी० कमी की उपस्थिति एवं फैलाव के बारे में सही संख्यात्मक जानकारी का उपलब्ध होना आवश्यक है। इसके लिए ३४० सेना के जवानों एवं ५२९ सामान्य लोगों (कुल ८६९) रक्त नमूने लिए गए। जी०-६ पी०डी० कमी की प्रतिशतता सेना के जवानों एवं सामान्य लोगों में क्रमशः १.८ एवं ३.२१% पायी गयी।
मलेरिया रोगवाहकों का सर्वेक्षण
रोगवाहकों के चिन्हीकरण और उपयुक्त नियंत्रण उपायों को अपनाने के लिये लामा छावनी,हुग्राजुली,नाहरणि,बैंगनाजुली,लामा छावनी के तराई क्षेत्रों,निगाम,गमनि,सटाई,केकुरीजान,बालिजान बनुवा,डफलागढ़,बिहाली,खेकिहोग्राम (नागालैण्ड) और किमिन (अरुणाचल प्रदेश) आदि क्षेत्रों में मलेरिया रोगवाहकों के लिये सर्वेक्षण किया गया। जो मलेरिया रोगवाहक मुख्यतः पाये गये वे हैं,एनोफिलीज मिनिमस,एनोफिलीज डाइरस,एनोफिलीज क्यूलिसिफैसीज,एनोफिलीज फिलिपाईनेसीज,एनोफिलीज एन्युलेरिस,एनोफिलीज मैक्युलेटस और एनोफिलीज फ्लुवियाटिलीज। सर्वाधिक मलेरिया रोगवाहक (२४-४६ प्रति रात) भालुकपोंग इलाके से संग्रह किये गये।
दंशक मक्खियों का नियंत्रण
मच्छरों,काटनेवाली मक्खियों एवं घरेलू मक्खियों के नियंत्रण के लिये बालासोर (उड़ीसा) के व्हीलर द्वीप का भ्रमण किया गया। व्हीलर द्वीप पर काटनेवाली मक्खियों ने डी० एस० सी० के लोगों के बीच उपद्रव मचा रखा था। इन मक्खियों की पहचान स्टोमोक्स प्रजाति के मक्खियों के रुप में की गयी।
इन कीटों के उत्पात को नियंत्रित करने के लिये निम्नलिखित कदम उठाये गये-
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सभी निगरानी बिंदुओं,प्रहरी कक्षों एवं निवास स्थलों के आंतरिक भागों में डेल्टामिथ्रीन का छिड़काव।
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संभावित प्रजनन स्थलों की खोज एवं कीटनाशकों का छिड़काव।
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मच्छरदानियों को कीटनाशकों से संसिक्त करना।
छत्रक का उत्पादन |
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छत्रक पौधों एवं जानवरों से अलग,'कवक' प्रजाति के भोज्य पदार्थ हैं। सड़ रहे कार्बनिक पदार्थों पर छत्रक बहुतायत मे पाये जाते हैं। हालाँकि सभी छत्रक भोज्य नही हैं क्योंकि कुछ छत्रक अत्यंत विषैले हैं। छत्रकों की विषैली प्रजातिओं को टोड-स्टूल के नाम से जाना जाता है। सारे विश्व मे छत्रकों की लगभग २००० से ज्यादा भोज्य प्रजातियाँ है। भारत मे छत्रकों के ७० वंशो की लगभग १८० भोज्य प्रजातियाँ पायी जाती है। जनजातीय लोग जंगलो से लायी गयी प्राकृतिक छत्रकों का बड़ी मात्रा मे उपयोग करते हैं।
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वर्तमान मे छत्रक उत्पादन की पहचान ऐसे मार्ग के रूप मे की गयी है जिसके द्वारा काष्ठ के व्यर्थ पदार्थों का उपयोग करके लाभ कमाया जा सके। छत्रक उत्पादन सुक्ष्मजीवीय तकनीक के कुछ चुनिंदा उन तरीकों मे से एक है जिसमे कृषि अवशिष्टों से उच्च प्रोटीनयुक्त भोजन प्राप्त किया जा सकता है। इसके अलावा इसकी वृद्धि के लिए सूर्य-प्रकाश,उर्वरा भूमि की आवश्यकता नही होती है,साथ ही साथ यह कार्बनिक पदार्थों पर भी वृद्धि कर सकता है।
भूमि के साथ-साथ वायु मे उपलब्ध जगहों पर भी छत्रक उतपादन करके लाभ कमाया जा सकता है। इस तकनीक के द्वारा पर्यावरण को दूषित करने वाले कृषि अवशिष्टों का सुरक्षित निपटान हो जाता है।
छत्रक बहुत ही लाभकारी पदार्थ है और अनेक लोगों के द्वारा इन्हे इनके उच्च प्रोटीन,विटामिन,एवं खनिजों की मात्रा के कारण पसंद किया जाता है। ताजे छत्रक में प्रोटीन की मात्रा इसके भार के २-३% तक होती है एवं इसकी प्रोटीन पशु प्रोटीन की तरह ही है। इसका पाचक गुणांक लगभग ८९% है। मुख्यतः यह एक अल्प कैलोरी का खाद्य-पदार्थ है (लगभग ३० कैलोरी/ १०० ग्राम ताजा भार),जिसमें ४-५% कार्बोहाईड्रेट की मात्रा है। इसमे मंड बिल्कुल नही है,यद्यपि चीनी की अल्प मात्रा (०.५%) है। इसमे मेद की मात्रा बहुत ही कम (०.३%) है। छत्रक में हृदय रोगियों के लिए हानिकारक कोलेस्ट्रोल बिल्कुल भी नही है,जबकि लाभप्रद आर्गो-स्टेरोल जो मानव शरीर के द्वारा विटामिन 'डी' मे परिर्वातत हो जाता है,पाया जाता है। छत्रक में अधिक मात्रा में रेशा पाया जाता है जो कब्ज निराकरण एवं शरीर से व्यर्थ पदार्थों के निष्कासन मे सहायक है।
भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र की जलवायु,यहाँ के पर्वतीय भूमि-प्रदेश से प्रभावित और चारित्रिक होती है। यहाँ कि जलवायु उष्ण आर्द से परिमित है,साथ ही साथ यहाँ लंबी अवधि तक वर्षा भी होती है। यह जलवायु छत्रक की विभिन्न प्रजातियों की खेती के लिए अनुरुप है। तेजपुर की जलवायविक अवस्था मे ओईस्टर एवं बटन प्रजातियों के उत्पादन को सिद्धांतित किया गया है। |
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| जैविक कृषि के लिये कृमि-खाद (वर्मी-कम्पोस्ट) |
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रक्षा अनुसंधान प्रयोगशाला,तेजपुर ने विभिन्न जैविक अवशिष्टों जैसे कि फसल के अवशेष,अपतृण,जलीय पौधे,वृक्षों के सूखे पत्ते,पशु-मल,रसोई के कूड़े,घरेलू कूड़ा-करकट और कृषि उद्योग के व्यर्थ पदार्थ इत्यादि से स्थानीय रुप से पाये जाने वाले केंचुवों पैरीयानिक्स एक्सकैवेटस (Perionyx excavatus) का प्रयोग करके बेहतरीन गुणवत्ता वाले कृमि-खाद को बनाने की एक कम खर्चीली तकनीक का विकास किया है। केंचुवे की यह प्रजाति व्यवसायिक रुप से उपयोग होने वाली नस्ल एसीनिया फोएटिडा(Eisenia foetida) के समान ही कारगर है।
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जैविक खाद की तुलना मे कृमि-खाद मे अधिक मात्रा मे पोषक तत्व पाये जाते हैं। यह नुकसानदायी जीवाणु,फफुँद एवं नेमाटोड से मुक्त है। यह उपयोगी जीवाणुओं की संख्या में बढ़ोत्तरी करता है जो कि केंचुवे के पाचन-तंत्र में भारी मात्रा में पाये जाते हैं। यह पादप पोषकों के भण्डार का कार्य करता है और भूमि में प्रयोग किये रसायनिक खाद की कारगरता को बढ़ाता है। यह भूमि का भूरभूरापन,वातन,उष्णता एवं जल धारण क्षमता को भी बेहतर करता है।
विश्व कीसबसेतीखीमिर्च
भारत से निर्यात होने वाली वस्तुओं में मिर्च के चुर्ण के निर्यात का एक अलग आकर्षण हैं। मिर्च की वार्षिक पौध भिन्न-भिन्न आकार,आकृति और रंग लिए होती है। इन मिर्चों में तीखेपन की मात्रा अलग-अलग होती है। भारतवर्ष ही एकमात्र ऐसा देश है जहाँ पर विभिन्न प्रजातिओं और अलग-अलग गुणवत्ता वाली मिर्च पायी जाती है। मध्यम तीखेपन वाली 'सन्नम' (Sannam) और कम तीखेपन वाली 'मुण्डू' (Mundu) नामक मिर्चियाँ अपनी बेहतरीन गुणवत्ता के लिए अन्तरराष्ट्रीय रुप से स्वीकृत हैं। चूर्ण और तैली-राल के रूप मे इन मिर्चियों के उत्पाद उपलब्ध है।
मिर्चियों का तीखापन इसमे पाये जाने वाले सात नजदीकी रुप से संबधित योगिकों के एक समूह कैप्सेइसिनोयेड् के कारण होता है,परंतु मिर्चियों का लगभग ९०% तीखापन कैप्सेइसिन और डाई-हाईड्रोकैप्सेइसिन के कारण होता है। मिर्चों का तीखापन स्कोविल ताप इकाई (Scoville heat unit,SHU) के पैमाने पर मापा जाता है।
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तथाकथित सबसे तीखी मिर्च 'रेड सबिना' (Red Savina) हैबेनेरियो की तीव्रता को स्कोविल ताप इकाई पर ५,७७,००० मापा गया। अत्यंत उग्र थाई मिर्चीयाँ केवल १,००,००० स्कोविल ताप इकाई तक तीव्र पायी गयी। ज्यादा सामान्य प्रजातियाँ जैसे जलापानों या इटालियन पोपरिनकिनो की उग्रता ५,००० स्कोविल ताप इकाई से भी कम है। र० अ० प्र० तेजपुर के द्वारा खोजी गयी मिर्च की प्रजाति कैप्सिकम फ्रुटीसिंस वर नागाहारी (Capsicum fruitescens var. Nagahari) जो मुख्यतः पूर्वोत्तर भारत के पहाड़ी क्षेत्रों में पायी जाती हैं की तीव्रता ८,५५,००० स्कोविल ताप इकाई दर्ज की गयी हैं। इस मिर्च मे कैप्सेइसिन और डाई-हाईड्रोकैप्सेइसिन की अधिकतम मात्रा है,इसीलिये यह विश्व की सर्वाधिक तीखी मिर्च प्रतीत होती है। |