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रक्षा
शरीरक्रिया
एवं संबद्ध विज्ञानं संस्थान (डिपास) आधिकारिक रूप
से 20 सितंबर, 1962 को स्थापित किया गया था। भारत में, सैन्य शरीरक्रिया विज्ञान में अनुसंधान रक्षा विज्ञान प्रयोगशाला, दिल्ली के
क्षेत्राधिकार में वैज्ञानिकों और चिकित्सा शरीर क्रिया
विज्ञानियों के एक छोटे समूह के माध्यम से 1950 में
शुरू
किया गया था। 1962 में अत्याधिक ऊंचे क्षेत्र में मानव में कठिन
दबाव वातावरण में शरीर क्रिया, पोषण तथा जैव रसायन की पहचान करने
और कार्यस्थलों तथा मानव इंटरफेस के
कार्यक्षमता
आंकलन हेतु जरूरत महसूस की गई तथा इसी वजह से एक पूर्ण प्रयोगशाला
की स्थापना की गई। 1968 में प्रयोगशाला को सेना बेस अस्पताल,
दिल्ली छावनी के परिसर के अंतर्गत स्थान बदल दिया गया। 1993 में
प्रयोगशाला को इसके वर्तमान स्थायी परिसर लखनऊ रोड़, तिमारपुर,
दिल्ली में ले जाया गया।
प्रारंभिक
वर्षों में
डिपास
ने रक्षा प्रचालनों के आवश्यक अनुप्रयोग के
सभी प्रमुख क्षेत्रों में अर्थात सैनिकों के लिए राशन स्केल और
पोषण, कपड़ों का आकार, पैदल सेना द्वारा भार ले जाने और उसका
वितरण, ताप उपशमन क्षेत्र की पहचान करने, गर्मी दुर्घटना के स्वरूप,
गर्मियों में नमक और पानी की आवश्यकता, नौसेना जहाजों के रहने
योग्य सर्वेक्षण और शारीरिक प्रशिक्षण तथा अनुकूल कार्यक्रम बनाने
में व्यापक योगदान दिया, जबकि प्रयोक्ताओं को पेश आ रही तत्काल
प्रचालन संबंधी जरूरतों से संबंधित इन मुद्दों पर कार्य जारी रखते
हुए समय तथा नई प्रौद्योगिकी के अनुसार अनुसंधान अध्ययन भी किए गए।
अत्यधिक ठंडे या गर्म वातावरण में निष्पादन में वृद्धि करने के लिए
योग और अपने को उसके अनुकूल ढालने के लिए अभ्यास करने, गर्मी, से
हुई पानी की अत्यंत कमी और इसे ठीक करने, एचएपीई का मनो-शरीर
क्रिया संबंधी तंत्र, अत्यधिक शोर से श्रवण शक्ति ह्रास के लिए
संरक्षात्मक तंत्र विकसित करने और रक्षात्मक वस्त्रों के ताप आंकलन
के संबंध में व्यापक अनुसंधान कार्य
किए गए।
आज,
डिपास
देश में शारीरक्रिया और जैव चिकित्सा अनुसंधान क्षेत्र
में एक प्रमुख प्रयोगशाला है, जिसका प्रारंभिक उद्देश्य रक्षा
प्रचालन के अति विषम वातावरण में मनुष्य की निष्पादन क्षमता को
बढ़ाना है। इसके पास 50 वैज्ञानिक 200 तकनीकी अधिकारी और सहायक
स्टाफ सदस्य और 30 अनुसंधान
अध्यनता
हैं तथा एक अत्याधुनिक अवसंरचना मौजूद है,
जिसमें वास्तविक फील्ड स्थितियों और प्रयोगशाला में तद्-नुरूप
निर्मित पर्यावरण में स्वैच्छिक रूप से भाग लेने वाले व्यक्तियों
पर अध्ययन करने की विशिष्ट अनुसंधान क्षमताएं है। इसकी गति
विश्लेषण तथा फोर्स प्लेट प्रणाली के साथ कार्यआंकलन प्रयोगशाला को
अत्याधुनिक रूप से बॉयोमैकेनिक अनुसंधान करने की क्षमता रखने के
लिए विकसित किया गया है। आक्रामक आर्गन प्रणाली अध्ययनों के लिए
प्राणी मॉडलों का प्रयोग किया जाता है। पादप तत्वों के वानस्पतिक
जांच के लिए कोशिका लाइन अनुसंधान को चरक कार्यक्रम में शामिल किया
गया है: सशस्त्र बलों के स्वास्थ्य के लिए जड़ी
बूटियाँ।
अन्य चालू कार्यक्रमों में जैव प्रौद्योगिकी 2000 और शरीर अनुकूलन
के
मोलिक्यूलर
जीवविज्ञान साधनों का व्यापक रूप से प्रयोग पर अध्ययन करना शामिल
है। प्रयोगशाला के पास देश के भीतर और विदेशों की जैव चिकित्सा
एजेंसियां और शिक्षाविदों का व्यापक नेटवर्क है।
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