यह लद्दाख क्षेत्र में उपजाऊ उपयुक्त फसलों के बारे में आपको कुछ शोध कार्य करने में योग्य है। मैं कल्पना करता हूं कि आपके लिए पहला चरण कुछ सक्षम व्यक्तियों को वहां की कार्यदशा को पता लगाने के लिए भेजना होगा। उन्हें पहले लद्दाख जाना चाहिए और वहां के उपायुक्त एवं अन्य के साथ विषय पर सलाह करनी चाहिए। बाद में आगे के क्षेत्र में उन्हे सेना के विमान से जाना चाहिए और वहां की स्थितियों को जानना चाहिए। तब आपको वह सूचित कर सकते हैं। आपके पर्यवेक्षण में स्वयं लेह में एक लघु शोध केंद्र का होना अवश्य वांछनीय हो सकता है।"
उनके निर्देशों का पालन करते हुए हिमालय के ऊंचे क्षेत्र लद्दाख प्रदेश में एक कृषि शोध स्टेशन स्थापित करने की संभावनाओं को खोजने के लिए एक सर्वेक्षण किया गया। भारतीय कृषि शोध परिषद पर वास्तव में कार्य प्रारंभ हुआ और लेह में एक शोध केंद्र स्थापित करते हुए अल्मोड़ा में से काटा गया। निश्चित रूप से यह भारत में ऊंचे स्थान पर कृषि शोध का प्रारंभ था। फिर भी, यातायात की समस्याओं को देखते हुए जुलाई 1962 में परियोजना को रक्षा शोध एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) को स्थानांतरित कर दिया गया, इसके द्वारा डीआरडीओ के रक्षा रणनीति में एक नए दृष्टिकोण की घोषणा की गई। अल्मोड़ा के सैन्यदल को उन्नत करते हुए जनवरी 1970 में इसे एक स्वतंत्र कृषि शोध इकाई (एआरयू) बना दिया गया।
मध्य हिमालय के विविध कृषि-पारिस्थितिकी अंचलों को घेरने की अपरिहार्यता को महसूस करते हुए अल्मोड़ा (1530 मी.) में नियंत्रण कार्यालय के अंतर्गत सूदूर सीमावर्ती क्षेत्रों औली (3142 मी.) और पिथौरागढ़ (1524 मी.) में क्षेत्रीय कार्यालय अप्रैल 1972 में खोले गए। एक अन्य अलग कार्यालय मई 1973 में हरसिल (3243 मी.) में और पारगमन आधारित जून 1981 में हलद्वानी (3243 मी.) में कठिन इलाकों में चल रही परियोजनाओं को माल की
सुविधा प्रदान करने के लिए बनाए। कृषि शोध इकाई (एआरयू) को एक प्रयोगशाला के स्तर पर प्रोन्नत किया गया एवं रक्षा कृषि शोध प्रयोगशाला (डीएआरएल) के रूप में 1984 में पुर्नसंरचित किया गया। जीआरटीयू राईवाला (340 मी.), जिला देहरादून प्रशिक्षण केंद्र जनवरी 1990 में खुला, जो विभिन्न चल रहे कार्यक्रमों में व्यस्त हैं। तात्कालीन सेना प्रमुख जनरल एस. एफ. रोड्रिग्स, पीवीएसएम, वीएसएम, एडीएल की पहल पर सैन्य बलों को ताजी सब्जियां एवं ब्रायलर चिकन के संबंध में माल की आपूर्ति को हल करने के लिए 1991 में (हिमाचल प्रदेश) 36 सेक्टर के ठंडे मरूस्थल में सब्जियों पर शोध एवं कृषि तथा ब्रायल उत्पादन प्रारंभ किया गया। प्रयोगशाला का हलद्वानी (333 मी.) हस्तांतरण अगस्त 1991 में हुआ और सितंबर 1996 में पिथौरागढ़ में (1524 मी.) में हुआ। इसी प्लांट से छोड़े गए खारे पानी का प्रयोग करते हुए नमकीन संचयी सब्जी की खेती को आवरण के लिए बाड़मेर (राजस्थान) के अरबा में शोध एवं विकास कार्य को बढ़ाया गया। अगस्त 2001 में कृषि-पशु पालन के अभ्यास के एकीकृत दृष्टिकोण को प्रयुक्त किया गया और ग्रामीण जनता के सामाजिक-आर्थिक उत्थान के लिए नागालैंड के दीमापुर जिले में विकसित तकनीक को प्रदर्शित किया गया।
प्राकृतिक जीव-संसाधन पर बहु-अनुशासनिक दृष्टिकोण की कृषि शोधों के अतिरिक्त अपनाया गया, इस दृष्टि के साथ कि, शोध एवं विकास के प्रयासों द्वारा नई तकनीकों की प्रस्तुति एवं विकास द्वारा मध्य-हिमालय के ऊंचे क्षेत्रों में सर्वांगीण विकास हो सके। डीएआरएल सक्रियता से सामुद्रिक विकास विभाग द्वारा आयोजित पांच अंटार्कटिक अभियानों जैसे ix, x, xi, xv और xvi में भाग ले चुका है। प्रयोगशाला ने सफलतापूर्वक हाइड्रोपोनिक्स को प्रस्तुत किया है और भारतीय अंटार्कटिक प्रयासों के इतिहास में पहली बार ध्रुवीय क्षेत्र में सब्जियों एवं फूलों की ग्रीन हाउस खेती को स्थापित किया है।
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