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द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान सोवियत सेना द्वारा 'कटयूशा' राकेटों
में लगाकर इन तोपों का जर्बदस्त प्रदर्शन किया गया। युद्ध के बाद
इसे और अधिक परिष्कृत किया गया। फ्री फ्लाइट आर्टिलरी रॉकेट व
मीडियम आर्टीलरी गन को भी इसमें शामिल किया गया। युद्ध के ट्रेंड
को देखते हुए एआरडीई ने मल्टी बैरल रॉकेट लांचर सिस्टम तैयार किया।
एआरडीई ने एसएस-20 122 मिमी वाले रॉकेट का सफलतापूर्वक विकास किया
है, इसमें एचईफ्रैगमेंटेशन वारहेड लगे हैं। छह लांचर मिलकर 20
सेकंड में 20 किमी के दायरे में 240 रॉकेट दाग सकते हैं। इस्पात के
चार टन से अधिक टुकड़ों एवं उच्च क्षमता के विस्फोटकों की सहायता
से यह फुटबाल फील्ड जितने बड़े सक्ष्य क्षेत्र को तहस-नहस कर सकता
है।
उच्च परिष्कृत एंटी टैंक गाइटेड मिसाइलों के आने के बाद भी जो कि
मेन बैटल टैंक (एमबीटी) को नाकों चना चबा सकता है और जो अब
सर्वाधिक कीफायती हथियार मान लिया गया है और जो हथियारों से लैस
एमबीटी को पराजित कर सकता है, वह उच्च वेलोसिटी वाला के.ई.
एम्यूनिशन है जिसे टैंको पर लगाई गई गनों से छोड़ा जाता है। आधुनिक
टैंको में फिन स्टेब्लाइज्ड आर्मर पायर्सिंग व डिस्कार्डिंग सेबोट
(एफएसएपीडीएस) द्वारा इसे अंजाम दिया जाता है। सैद्धांतिक तौर पर
यह उच्च गतिज उर्जा वाला, अति घना, तीर के आकार के पेनेट्रेटर से
इसे उच्च आवेग (वेलोसिटी) से छोड़ा जाता है और यह कई लेयरों वाले
आधुनिक एमबीटी को नाकों चने चबवा सकता है। हालांकि इसका डिजाइन
काफी साधारण-सा लगता है पर उत्पादन तकनीक की काफी मांग है। एआरडीई
ने सफलतापूर्वक 105 एमएम फिन स्टेब्लाइज्ड आर्मर पायर्सिंग
डिस्कॉर्डिंग सेवोट (एफएसपीडीएस) का निर्माण विजयंत व टी-55 एमबीटी
के लिए किया है। इस उन्नत हथियार के निर्माण पर एआरडीई को गर्व है
और भारत देश उन गिने चुने देशों में शामिल हो गया है जिनके पास
एफएसपीडीएस का डिजाइन व उत्पाद की तकनीक है और इस प्रकार विदेशों
से तकनीक का आयात न कर विदेशी मुद्रा की देश ने बचत की है।
एआरडीई ने 51 एमएम लाइट वेट इनफैंट्री प्लाटून मोर्टार विकसित किया
है। यह ऐसा हथियार है जो पोर्टेबल है और यह 2 इंच वाले मोर्टार की
अपेक्षा अधिक क्षेत्र में गोले बरसा सकता है। मारक क्षमता बढ़ाने
के लिए वजन को बढ़ाना जरूरी नहीं होता। इसके एचई बम में विखंडन
पूर्व तकनीक का इस्तेमाल होता है और सामान्य बमों की अपेक्षा अधिक
घातक होता है। गोला-बारूद के जखीरे में धुंऐ के अलावा प्रकाश करने
वाले एवं प्रचलित बमों का भी विकास किया गया है। आयुध कारखानों में
इसके उत्पादन पर फिलहाल काम चल रहा है।
आधुनिक सैन्य कार्यवाही रात में एवं विपरीत परिस्थितियों में भी
होती है। रात के युद्ध में नाइट वीजन डिवाइसेस होने के बावजूद
चमकीले गोले बारूद की जरूरत होती है। युद्ध के मैदान में युद्ध
स्थल को प्रकाशित करने में इसकी जरूरत होती है। यह रक्षा करने,
आक्रमण करने व लड़ाई के मैदान की पहचान में सहायक होता है। पैदल
सैनिकों व लाइट आर्टीलरी के लिए कई चमकीले गोला-बारूद तैयार किए
जाते हैं। इन बमों के प्रदर्शन की तुलना विश्व के सर्वोत्कृष्ट
बमों से की जा सकती है।
हथियारबंद सैनिकों के लिए टी-55 एमबीटी के अप-गनिंग किट के विकास
में हमने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। विजयंत टैंक के पीछे मूल 100
मिमी गन लगाया गया जिसने टैंक की मारक क्षमता को बढ़ा दिया। तोप व
गोला-बारूद का आधुनिकीकरण होने से लॉजिस्टिक भार कम हो गया। मजबूत
चेसिस एवं कंगूरे के साथ-साथ उन्नत गन व गोला-बारूद होने के कारण
टी-55 की तुलना में टी-72एस एवं विजयंत टैंको से उचित रूप में की
जा सकती है।
अद्रुश्य - नब्बे के दशक के दौरान एमबीटी के बढ़ते खतरे से निबटने
के लिए अद्रुश्य सक्षम है। इसमें चुंबकीय के साथ-साथ भूकंप रोधक
प्रभाव होने से खान युद्ध को इसने एक नया रूप दिया है। परिष्कृत
होने के साथ-साथ इसकी अदम्य मारक क्षमता से खान दुश्मन की आंखों से
ओझल हो जाते हैं। यह काम में लाने में भी आसान है, वर्ष 1997 से
ओएफएस पर निर्माण कार्य जारी है।
ऊंचे स्थानों पर प्रोक्सीमिटी फ्यूज को आर्टीलरी प्रोजेक्टाइल के
साथ प्रयोग में इसीलिए लाया जाता है ताकि यह अधिक से अधिक
प्रभावकारी बन सके। एंटी एटरक्राफ्ट व एंटी मिसाइल के रूप में भी
इसे काम में लाया जाता है, इससे "नजदीकी चूकें" निश्चित "मौत" में
बदल जाती है जिसके परिणामस्वरूप हथियार प्रणाली के पूर्ण निष्पादन
में बढ़ोतरी होती है। अपने अधीन प्रयोगशालाओं के सहयोग से एआरडीई
ने प्रोक्सिमिटी फ्यूज तैयार किया है जो सार्वजनिक उपक्रमों व आयुध
कारखानों में निर्माणधीन हैं। फ्यूज में परिष्कृत इलेक्ट्रॉनिक
डिवाइस लगे होते हैं जो प्रोडेक्टाइल छोड़ने के साथ-साथ हजारों
'जी' फोर्स का मुकाबला करने में सक्षम हैं।
शांत माहौल में सैनिकों को प्रशिक्षण इसीलिए दिया जाता है ताकि
लड़ाई में वे मशीन के साथ और अधिक कारगर हो सके। इसे ध्यान में
रखते हुए एआरडीई ने सेना के लिए कई प्रशिक्षण उपकरणों का विकास
किया है वे निम्नलिखित हैं:
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इनफैंट्री सैनिकों के लिए 81 मिमी मोर्टार ट्रेनिंग उपकरण
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आर्टिलरी के लिए 120 मिमी मोर्टार ट्रेनिंग उपकरण
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0.50 सबकैलिबर ट्रेनिंग उपकरण 105 मिमी विजंयता टैंक गन के लिए।
इन उपकरणों के जरिए हथियार चलानेवाले दस्ते को सही मायने में
हथियार चलाने का प्रशिक्षण दिया जाता है जिस पर लागत हथियारों के
जखीरे की खरीद का एक
अंग होता है। इससे बड़े पैमाने पर फायरिंग रेंज की जरूरत भी खत्म
हो गई। प्रशिक्षण की इन व्यवस्थाओं के जरिए सैनिकों को किफायती दर
पर प्रशिक्षण देना संभव हो पाता है। |