| आयुध निदेशालय डीआरडीओ मुख्यालय के सबसे पुराने निदेशालयों में से एक है जिसकी उत्पत्ति आयुध निरीक्षणालय से हुई है जो द्वितीय विश्व युद्ध के समय से ही अस्तित्व में था। इस निरीक्षणालय का नाम पचास के दशक के मध्य में बदल कर आयुध निदेशालय रखा गया। आयुध निदेशालय आयुध समूह की प्रयोगशालाओं, मसलन एआरडीई, सीएउईईएस, एचईएमआरएल, टीबीआरएल, और पीएक्सई संबंधी कामों में सामंजस्य स्थापित करता है। |
इस निदेशालय के पास पांच तकनीकी समूह हैं: |
पहला समूह : पैदल सेना, तोपखाने और स्थल सेना के लिए हवाई रक्षा तोपखाने से संबंधित परियोजनाओं समेत विभिन्न गतिविधियों का समायोजन करता है। यह एआरडीई, पूना के लिए एकल खिड़की के रूप में भी काम करता है।
दूसरा समूह : बख्तरबंद कोर और अभियांत्रिकी संबंधी परियोजनाओं समेत विभिन्न गतिविधियों के बीच तालमेल बिठाने के साथ-साथ यह समूह पीएक्सई, पूना के लिए एकल खिड़की की तरह भी काम करता है।
तीसरा समूह : वायु सेना, नौ आयुध और तोपखाने के राकेटों समेत विभिन्न गतिविधियों का समायोजन करता है। इसके अलावा यह एचईएमआरएल, पूना के लिए एकल खिड़की की तरह भी काम करता है।
चौथा समूह : अग्नि, पर्यावरण और विस्फोटक सुरक्षा संबंधी परियोजनाओं सहित विभिन्न गतिविधियों का समायोजन करता है और सीएफईईएस, दिल्ली के लिए एकल खिड़की के रूप में भी काम करता है।
पांचवां समूह : तकनीकी सेवा का समूह है जो आयुध निदेशालय का प्रशासनिक काम-काज भी देखता है। यह मंत्रियों, विभिन्न तकनीकी समितियों के सवालों-उनकी उठायी आपत्तियों के जवाब देने, आयुध समूह की प्रयोगशालाओं वगैरह में चल रही परियोजनाओं से संबंधित आंकड़े रखने जैसे अनेक काम करता है। साथ ही साथ यह टीबीआरएल, चंडीगढ़ के लिए एकल खिड़की के रूप में भी काम करता है।
इसके अलावा यह निदेशालय डीआरडीओ के आयुध शोध परिषद का सचिव भी है, जिसका गठन 1997 में वित्तीय अनुदान योजना के तहत अकादमीय संस्थानों और उद्योगों में मौलिक आयुध के क्षेत्र में शोध को प्रोत्साहन और समर्थन देने के लिए किया गया था। |
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